मंत्र, चालीसा एवं आरती संग्रह

मंत्र, चालीसा एवं आरती का महत्त्व
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि हमारे सनातन धर्म मे मंत्र चालीसा और आरती तीनों ही बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इन सभी का ईश्वरीय आराधना भक्ति में विशेष योदान है। मंत्रो का जाप करना। चलिसा का पाठ और आरती करने से भक्तों पर ईश्वर की असीम कृपा बरसती है।
मंत्र:
मंत्र संस्कृत भाषा मे शब्द या वाक्यांश होते हैं। जिनका जाप करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। और नियमित रूप से मन्त्रों का जाप करने से मन शांत तथा अपने आराध्य देव के प्रतिचित्त एकाग्र होता है। और मनुष्य को दिव्यता का आभाष होता है।
चालीसा:
चालीसा में चालीस चौपाइयाँ होती हैं। जिसके द्वारा किसी विशेष देवता का की महिमा का गुणगान होता है। चालिसा का पाठ करने से भक्त को अपने आराध्य देव की कृपा प्राप्त होती हैं। और भक्त क्र जीवन में सकारात्मक बदलाव आते है।
आरती :
सनातन धर्म में आरती का विशेष महत्त्व है। सनातन धर्म के तैंतीस करोड़ देवी देवताओं की आरती का व्याख्यान है। किसी भी देवी – देवता के व्रत एवं पूजा की सम्पन्नता के बाद आरती करना अति आवश्य्क है। जिसमे अपने आराध्य देवता के सम्मुख घी का दीपक एवं कपूर और कई अन्य सुगन्धित वस्तुओं को मिलाकर एक हवंन सामग्री तैयार कर उसे जलाकर, देवी देवताओं की आरती कर उन्हें प्रसन्न किया जाता है।
श्री गणेश जी चालीसा, मंत्र एवं आरती

श्री गणेश जी चालीसा, मंत्र एवं आरती
सभी प्रिय पाठकों का@aaghaz_e_nisha website में हार्दिक स्वागत है। सनातन धर्म के अनुसार प्रथम पूज्य गणेश जी की पूजा आराधना करने से व्यक्ति के जीवन में आ रही समस्त परेशानी एवं सभी विघ्न दूर होतें हैं। तथा व्यक्ति को सुख विभव एवं सफलता की प्राप्ति होती है। गजानन की भक्ति प्रतिदिन करनी चाहिए। पर पौराणिक कथाओं के अनुसार गणपति गजानन जी को बुधवार का दिन अति प्रिय है। कहा जाता है कि बुधवार के दिन यदि गणेश जी को दूर्वा चढ़ाई जाए जो कि उन्हें अत्यंत प्रिय है। गणपति उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। तथा किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत से गणेश जी के पूजन से किया जा जाता है। कहते हैं,कि गणेश जी सारे विघ्न हरते हैं। इसलिए उन्हें विघ्नहर्ता भी कहा जाता है! ऐसे ही उनके 108 नाम और मंत्र हैं जिनका जाप करने से भक्तजनों को कई पाप संकटों से छुटकारा मिलता है। यदि आप भी गणपति जी के भक्त हैं। एवं गणपति जी की पूजा आराधना करके उनकी आरती तथा उनके मंत्र जाप एवं चालीसा पढ़कर आप भी अपना जीवन संवारना चाहते हैं। तो आप सही जगह आए हैं।
यहां पर आपको गणपति जी के 108 नाम, उनके बीज मंत्र, गणपति चालीसा एवं गणपति जी की आरती
उपलब्ध है।
हमें सेवा का अवसर प्रदान करने के लिए आपका शहर दिल से धन्यवाद…
।।जय श्री राधे राधे।।
श्री गणेश के महामंत्र एवं बीज मंत्र
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
गणेश जी का यह महामंत्र गणेश जी को अति प्रिय है। जो सबसे अधिक लोकप्रिय एवं सुप्रसिद्ध एवं अत्यंत पवित्र है। इस मंत्र का अर्थ है – कि जिनकी सुंड घुमावदार है, और जिनका शरीर विशाल है, जो करोड़ सूर्यों के समान तेजस्वी हैं, वही भगवान मेरे सभी काम बिना बाधा के पूरे करने की कृपा करें।
ओम गं गणपतये नमः
सनातन धर्म के अनुसार ओम गं गणपतये नमः का यह बीज मंत्र
भगवान श्री गणेश जी का बेहद प्रभावशाली बीज मंत्र है, इस मंत्र का जाप कर आप अपनी सभी कामनाओं को पूर्ण कर सकते हैं। बीज मंत्र से मिलकर बने मंत्र ‘ओम गं गणपतये नमः’ का जप करने से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।साथ ही आर्थिक प्रगति, धन, वैभव तथा अपार सुख की प्राप्ति होती है…
श्री गणेश चालीसा
गणेश चालीसा का पाठ करने से लाभ
गणेश चालीसा का पाठ करने से बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है।
गणेश चालीसा का पाठ करने से सुख और समृद्धि में वृद्धि होती है।
गणेश चालीसा का पाठ करने से विघ्न और बाधाएं दूर होती हैं।
॥ दोहा ॥
जय गणपति सदगुण सदन,
कविवर बदन कृपाल ।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल ।।
॥चौपाई ॥
जय जय जय गणपति गणराजू ।
मंगल भरण करण शुभः काजू ।।
जै गजबदन सदन सुखदाता ।
विश्व विनायका बुद्धि विधाता ।।
वक्र तुण्ड शुची शुण्ड सुहावना ।
तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ।।
राजत मणि मुक्तन उर माला ।
स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ।।
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं ।
मोदक भोग सुगन्धित फूलं ।।
सुन्दर पीताम्बर तन साजित ।
चरण पादुका मुनि मन राजित ।।
धनि शिव सुवन षडानन भ्राता ।
गौरी लालन विश्व-विख्याता ।।
ऋद्धिसिद्धि तव चंवर सुधारे ।
मुषक वाहन सोहत द्वारे ।।
कही जन्म शुभ कथा तुम्हारी ।
अति शुची पावन मंगलकारी ।।
एक समय गिरिराज कुमारी ।
पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी ।।
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनुपा।
तब पहुंच्यो तुम धरी द्विज रूपा ।।
अतिथि जानी के गौरी सुखरी ।
बहुविधि सेवा करी तुम्हारी ।।
अति प्रसन्न हवे तुम वर दीन्हा ।
मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ।।
मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला ।
बिना गर्भ धारण यहि काला ।।
गणनायक गुण ज्ञान निधाना ।
पूजित प्रथम रूप भगवाना ।।
अस कही अन्तर्धान रूप हवे ।
पालना पर बालक स्क्रूरूप हवे ।।
बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना ।
लखि मुख सुख नहि गौरी समाना ।।
सकल मगन, सुखमंगल गावहि ।
नाभ ते सुरन, सुमन वर्षावहि ।।
शम्भु, उमा, बहुदान लुटावहि ।
सुर मुनिजन, सुत देखन आवहि ।।
लखि अति आनन्द मंगल साजा ।
देखन भी आये शनि राजा ।।
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं ।
बालक, देखन चाहत नाहीं ।।
गिरिजा कछु मन भेद बढायो ।
उत्सव मोर, न शनि तुही भायो ।।
कहत लगे शनि, मन सकुचाई ।
का करिहो, शिशु मोहि दिखाई ।।
नहि विश्वास, उमा उर भयऊ ।
शनि सों बालक देखन कहयऊ ।।
पदतहि शनि हग कोण प्रकाशा ।
बालक सिर उड़ि गयो अकाशा ।।
गिरिजा गिरी विकल हवे धरणी ।
सो दुःख दशा गयो नहीं वरणी ।।
हाहाकार मच्यो कैलाशा ।
शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा ।।
रत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो ।
काटी चक्र सो गज सिर लाये ।।
बालक के धड़ ऊपर धारयो ।
प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो ।।
नाम गणेश शम्भु तव कीन्हे ।
प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वर दीन्हे ।।
बुन्द्रि परीक्षा जब शिव कीन्हा ।
पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा ।।
चले षडानन, भरमि भुलाई ।
रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई ।।
चरण मातु-पितु के धर लीन्हें ।
तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें ।।
धनि गणेश कही शिव हिये हरपे नभ ते।
सुरन सुमन बहु बरसे ।।
तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई ।
शेष सहसमुख सके न गाई।।
मै मतिहीन मलीन दुखारी ।
करहूं कौन विधि विनय तुम्हारी ।।
भजत रामसुन्दर प्रभुदासा ।
जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा ।।
अब प्रभु दया दीना पर कीजे ।
अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजे ।।
॥ दोहा ॥
श्री गणेशा यह चालीसा,
पाठ करे कर ध्यान ।
नित नव मंगल गृह बसे,
लहे जगत सन्मान ।।
सम्बंध अपने सहस्त्र दश,
ऋषि पंचमी दिनेश ।
पूरण चालीसा भयो,
मंगल मूर्ती गणेश ।।
गणेश जी की आरती (जय गणेश देवा )
जय गणेश जय गणेश,जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।।
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा।।
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।।
अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माय।।
जय गणेश, जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।।
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।।
सूर श्याम शरण आए, सफल कीजै सेवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।।
जय गणेश, जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।।
दिनन की लाज राखो, शंभु सुतकारी।
कामना को पूर्ण करो जाऊं बलिहारी।।
जय गणेश, जय गणेश जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा।।
गणेश जी की आरती (सुख करता दुःख हर्ता )
सुख करता दुखहर्ता, वार्ता विघ्नाची
नूर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची
सर्वांगी सुन्दर उटी शेंदु राची
कंठी झलके माल मुकताफळांची
जय देव जय देव, जय मंगल मूर्ति
दर्शनमात्रे मनःकमाना पूर्ति
जय देव जय देव
रत्नखचित फरा तुझ गौरीकुमरा
चंदनाची उटी कुमकुम केशरा
हीरे जडित मुकुट शोभतो बरा
रुन्झुनती नूपुरे चरनी घागरिया
जय देव जय देव, जय मंगल मूर्ति
दर्शनमात्रे मनःकमाना पूर्ति
जय देव जय देव
लम्बोदर पीताम्बर फनिवर वंदना
सरल सोंड वक्रतुंडा त्रिनयना
दास रामाचा वाट पाहे सदना
संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवर वंदना
जय देव जय देव, जय मंगल मूर्ति
दर्शनमात्रे मनःकमाना पूर्ति
जय देव जय देव
शेंदुर लाल चढायो अच्छा गजमुख को
दोन्दिल लाल बिराजे सूत गौरिहर को
हाथ लिए गुड लड्डू साई सुरवर को
महिमा कहे ना जाय लागत हूँ पद को
जय जय जय जय जय
जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता
धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मत रमता
जय देव जय देव
अष्ट सिधि दासी संकट को बैरी
विघन विनाशन मंगल मूरत अधिकारी
कोटि सूरज प्रकाश ऐसे छबी तेरी
गंडस्थल मद्मस्तक झूल शशि बहरी
जय जय जय जय जय
जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता
धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मत रमता
जय देव जय देव
भावभगत से कोई शरणागत आवे
संतति संपत्ति सबही भरपूर पावे
ऐसे तुम महाराज मोको अति भावे
गोसावीनंदन निशिदिन गुण गावे
जय जय जी गणराज विद्यासुखदाता
धन्य तुम्हारो दर्शन मेरा मत रमता
जय देव जय देव
“आरती शिवजी”

जय शिव ओंकारा, भज शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धाङ्गी धारा।
एकानन चतुरानन पंचानन राजै।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजै।
दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहै।
त्रिगुन रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे।
अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी।
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक करुणादिक भूतादिक संगे।
करके मध्ये कमंडलु चक्र त्रिशुलधर्ता ।
सुखकारी दुखहारी जगपालन कर्ता ।
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
प्रणवाक्षर में शोभित ये तीनों एका।
त्रिगुण स्वामी जी की आरती जो कोई नर गावे ।
कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पत्ति पावे ।
हनुमान चालीसा एवं आरती

हनुमान चालीसा दोहा और चौपाई
दोहा :
श्री गुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।।
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं, हरहु कलेस बिकार।।
चौपाई :
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुं लोक उजागर।।
रामदूत अतुलित बल धामा।
अंजनि-पुत्र पवनसुत नामा।।
महाबीर बिक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी।।
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा।।
हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै।
कांधे मूंज जनेऊ साजै।।
संकर सुवन केसरीनंदन।
तेज प्रताप महा जग बन्दन।।
विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया।।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
बिकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे।।
लाय सजीवन लखन जियाये।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये।।
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।।
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा।।
जम कुबेर दिगपाल जहां ते।
कबि कोबिद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा।।
तुम्हरो मंत्र बिभीषन माना।
लंकेस्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्र जोजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू।।
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं।
जलधि लांघि गये अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।।
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना।।
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हांक तें कांपै।।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै।
महाबीर जब नाम सुनावै।।
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।।
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा।
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोइ अमित जीवन फल पावै।।
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु-संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे।।
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा।।
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम-जनम के दुख बिसरावै।।
अन्तकाल रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरि-भक्त कहाई।।
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।।
जै जै हनुमान गोसाई।
कृपा करहु गुरूदेव की नाई।।
जो सत बार पाठ कर कोई।
छुटहि बंदि महा सुख होई।।
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि सखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मंह डेरा।।
दोहा
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
आरती जय जगदीश हरे

ओ३म् जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे ।
भक्त जनन के संकट क्षण में दूर करे।
जो ध्यावे फल पावे दुख विनसे मन का।
सुख सम्पत्ति घर आवे कष्ट मिटे तन का।
मात-पिता तुम मेरे शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा आस करूं जिसकी ।
तुम पूरण परमात्मा तुम अन्तर्यामी ।
पारब्रह्म परमेश्वर तुम सब के स्वामी।
तुम करुणा के सागर तुम पालन कर्ता।
मैं मूरख खल कामी कृपा करो भर्ता ।
तुम हो एक अगोचर सबके प्राणपति ।
किस विधि मिलूं दयामय तुमको मैं कुमति।
दीनबन्धु दुःखहर्ता तुम रक्षक मेरे।
करूणा हस्त उठाओ द्वार पड़ा तेरे।
विषय विकार मिटाओ पाप हरो देवा।
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ सन्तन की सेवा।
ओ३म् जय जगदीश हरे ॥
।।श्री विष्णु सहस्त्रनाम।।

भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः ।। 1 ।।
पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः। अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च ।। 2 ।।
योगो योग-विदां नेता प्रधान-पुरुषेश्वरः । नारसिंह-वपुः श्रीमान केशवः पुरुषोत्तमः ।। 3 ।।
सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुः भूतादिः निधिः अव्ययः । संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुः ईश्वरः ।। 4 ।।
स्वयंभूः शम्भुः आदित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः । अनादि-निधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ।। 5 ।।
अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभो-अमरप्रभुः । विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ।। 6 ।।
अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः । प्रभूतः त्रिककुब-धाम पवित्रं मंगलं परं ।। 7।।
ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः । हिरण्य-गर्भो भू-गर्भो माधवो मधुसूदनः ।। 8 ।।
ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः । अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृति: आत्मवान ।। 9 ।।
सुरेशः शरणं शर्म विश्व-रेताः प्रजा-भवः ।अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ।। 10 ।।
अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिः अच्युतः । वृषाकपिः अमेयात्मा सर्व-योग-विनिःसृतः ।। 11 ।।
वसुःवसुमनाः सत्यः समात्मा संमितः समः । अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ।। 12 ।।
रुद्रो बहु-शिरा बभ्रुः विश्वयोनिः शुचि-श्रवाः । अमृतः शाश्वतः स्थाणुः वरारोहो महातपाः ।। 13 ।।
सर्वगः सर्वविद्-भानुःविष्वक-सेनो जनार्दनः । वेदो वेदविद-अव्यंगो वेदांगो वेदवित् कविः ।। 14 ।।
लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृता-कृतः । चतुरात्मा चतुर्व्यहः-चतुर्दष्ट्रः-चतुर्भुजः ।। 15 ।।
भ्राजिष्णु भोजनं भोक्ता सहिष्णुः जगदादिजः । अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ।। 16 ।।
उपेंद्रो वामनः प्रांशुः अमोघः शुचिः ऊर्जितः । अतींद्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ।। 17 ।।
वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः।
अति-इंद्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ।। 18 ।।
महाबुद्धिः महा-वीर्यो महा-शक्तिः महा-द्युतिः। अनिर्देश्य-वपुः श्रीमान अमेयात्मा महाद्रि-धृक ।। 19
महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः । अनिरुद्धः सुरानंदो गोविंदो गोविदां-पतिः ।। 20 ।।
मरीचिःदमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः । हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ।। 21 ।।
अमृत्युः सर्व-दृक् सिंहः सन-धाता संधिमान स्थिरः । अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ।। 22 ।।
गुरुः गुरुतमो धामः सत्यः सत्य-पराक्रमः । निमिषो-अ-निमिषः स्रग्वी वाचस्पतिः उदार-धीः ।। 23 ।।
अग्रणीः ग्रामणीः श्रीमान न्यायो नेता समीरणः । सहस्र-मूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात ।। 24 ।।
आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सं-प्रमर्दनः । अहः संवर्तको वह्निः अनिलो धरणीधरः ।। 25 ।।
अमृताशूद्भवा भानुः शशाबदुः सुरश्वरः । औषधं जगतः सेतुः सत्य-धर्म-पराक्रमः ।। 31 ।।
भूत-भव्य-भवत्-नाथः पवनः पावनो-अनलः । कामहा कामकृत-कांतः कामः कामप्रदः प्रभुः ।। 32
युगादि-कृत युगावर्ती नैकमायो महाशनः । अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजित्-अनंतजित ।। 33 ।।
इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शिखंडी नहुषो वृषः । क्रोधहा क्रोधकृत कर्ता विश्वबाहुः महीधरः ।। 34 ।।
अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः । अपाम निधिरधिष्टानम् अप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ।।35 ।।
स्कन्दः स्कन्द-धरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः । वासुदेवो बृहद भानुः आदिदेवः पुरंदरः ।। 36 ।।
अशोकः तारणः तारः शूरः शौरिः जनेश्वरः । अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ।। 37 ।।
पद्मनाभो-अरविंदाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत । महर्धि-ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुड़ध्वजः ।। 38 ।।
अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः । सर्वलक्षण लक्षण्यो लक्ष्मीवान समितिंजयः ।। 39 ।।
विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुः दामोदरः सहः । महीधरो महाभागो वेगवान-अमिताशनः ।। 40 ।।
उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः । करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ।। 41 ।।
व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो-ध्रुवः । परर्रद्वि परमस्पष्टः तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ।। 42 ।।
रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयो-अनयः । वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठः धर्मो धर्मविदुत्तमः ।। 43 ।।
वैकुंठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः । हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ।। 44।।
ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः । उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्व-दक्षिणः ।। 45 ।।
विस्तारः स्थावरः स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम । अर्थो अनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ।। 46 ।।
अनिर्विण्णः स्थविष्ठो-अभूर्धर्म-यूपो महा-मखः । नक्षत्रनेमिः नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ।। 47 ।।
यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः । सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमं ।। 48 ।।
सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत । मनोहरो जित-क्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ।। 49 ।।
धर्मगुब धर्मकृद धर्मी सदसत्क्षरं-अक्षरं । अविज्ञाता सहस्त्रांशुः विधाता कृतलक्षणः ।। 51 ।।
गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः । आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद गुरुः ।। 52 ।।
उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः । शरीर भूतभृद्भोक्ता कपींद्रो भूरिदक्षिणः ।। 53 ।।
सोमपो-अमृतपः सोमः पुरुजित पुरुसत्तमः । विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ।। 54
जीवो विनयिता-साक्षी मुकुंदो-अमितविक्रमः । अम्भोनिधिरनंतात्मा महोदधिशयो-अंतकः ।। 55 ।।
अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः । आनंदो नंदनो नंदः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ।। 56 ।।
महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः । त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश्रृंगः कृतांतकृत ।। 57 ।।
महावराहो गोविंदः सुषेणः कनकांगदी । गुह्यो गंभीरो गहनो गुप्तश्चक्र-गदाधरः ।। 58 ।।
वेधाः स्वांगोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणो-अच्युतः । वरूणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ।। 59 ।।
भगवान भगहानंदी वनमाली हलायुधः । आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुः-गतिसत्तमः ।। 60
सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः । दिविःस्पृक् सर्वदृक व्यासो वाचस्पतिःअयोनिजः ।। 61 ।।
त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक । संन्यासकृत्-छमः शांतो निष्ठा शांतिः परायणम ।। 62
शुभांगः शांतिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः । गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ।। 63 ।।
अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृत्-शिवः । श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ।। 64 ।।
श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः । श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमान्-लोकत्रयाश्रयः ।। 65 ।।
स्वक्षः स्वंगः शतानंदो नंदिज्र्योतिर्गणेश्वरः । विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ।। 66
उदीर्णः सर्वतःचक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः । भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ।। 67 ।।
अर्चिष्मानर्चितः कुंभो विशुद्धात्मा विशोधनः । अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ।। 68 ।।
कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः । त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ।। 69
ब्रह्मविद ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ।। 71 ।।
महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः । महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ।। 72 ।।
स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः । पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः।। 73 ।।
मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः । वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ।। 74 ।।
सद्गतिः सकृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः । शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ।।
75 ।।
भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयो-अनलः । दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरो-अथापराजितः ।।
76 ।।
विश्वमूर्तिमहार्मूर्तिः दीप्तमूर्तिः अमूर्तिमान । अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ।।
77 ।।
एको नैकः सवः कः किं यत-तत-पद्मनुत्तमम । लोकबंधुः लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ।।
78 ।।
सुवर्णोवर्णो हेमांगो वरांग: चंदनांगदी । वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरऽचलश्च…
तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः । प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश्रृंगो गदाग्रजः ।।
81 ।।
चतुर्मूर्तिः चतुर्बाहुःश्चतुर्यूहः चतुर्गतिः । चतुरात्मा चतुर्भावः चतुर्वेदविदेकपात ।। 82 ।।
समावर्तो-अनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः । दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ।।
83 ।।
शुभांगो लोकसारंगः सुतंतुस्तंतुवर्धनः । इंद्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ।।
84 ।।
उद्भवः सुंदरः सुंदो रत्ननाभः सुलोचनः । अर्को वाजसनः श्रृंगी जयंतः सर्वविज-जयी ।।
85 ।।
सुवर्णबिंदुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः । महाह्रदो महागर्ती महाभूतो महानिधः ।।86 ।।
कुमुदः कुंदरः कुंदः पर्जन्यः पावनो-अनिलः । अमृतांशो-अमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।।
87 ।।
सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः । न्यग्रोधो औदुंबरो-अश्वत्थः चाणूरांध्रनिषूदनः ।।
88 ।।
सहस्रार्चिः सप्तजिव्हः सप्त…
भारभृत्-कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः । आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ।।
91 ।।
धनुर्धरो धनुर्वेदो दंडो दमयिता दमः । अपराजितः सर्वसहो नियंता नियमो यमः ।। 92 ।।
सत्त्ववान सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः । अभिप्रायः प्रियार्हो-अर्हः प्रियकृत-प्रीतिवर्धनः ।।
93
विहायसगतिर्योतिः सुरुचिहुतभुग विभुः । रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ।।
94 ।।
अनंतो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः । अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकधिष्ठानमद्भुतः ।।
95।।
सनात्-सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः । स्वस्तिदः स्वस्तिकृत स्वस्ति स्वस्तिभुक स्वस्तिदक्षिणः 11 96 ।।
अरौद्रः कुंडली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः । शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ।। 97 ।।
अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः । विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।। 98 ।।
उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः । वीरहा रक्षणः संतो जीवनः पर्यवस्थितः ।।
99 ।।
[4:10 PM, 10/17/2025] nisha shahi: अनंतरूपो-अनंतश्रीः जितमन्युः भयापहः । चतुरश्रो गंभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ।।
100
अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिरांगदः । जननो जनजन्मादिः भीमो भीमपराक्रमः ।। 101 ।।
आधारनिलयो-धाता पुष्पहासः प्रजागरः । ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ।।
102 ।।
प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत प्राणजीवनः । तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्यु जरातिगः ।।
103 ।।
भूर्भवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः । यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञांगो यज्ञवाहनः ।। 104 ।।
यज्ञभृत्-यज्ञकृत्-यज्ञी यज्ञभुक्-यज्ञसाधनः । यज्ञान्तकृत-यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ।। 105 ।।
आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः । देवकीनंदनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ।। 106 ।।
शंखभृन्नंदकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः । रथांगपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ।। 107 ।।
सर्वप्रहरणायुध ॐ नमः इति ।
वनमालि गदी शार्की शंखी चक्री च नंदकी । श्रीमान् नारायणो विष्णुः वासुदेवोअभिरक्षतु ।
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